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चार्ल्स डार्विन डे 12 फरवरी पर विशेष क्या हमारे पूर्वज बंदर थे ?

चार्ल्स डार्विन डे 12 फरवरी पर विशेष क्या हमारे पूर्वज बंदर थे ?

चार्ल्स डार्विन का जख्म 12 फरवरी 1809 में हुआ और मृत्यु 19 अप्रैल 1882 में एक प्रकृति वैज्ञानिक वे इनका इतिहास में एक अनूठा स्थान है। चार्ल्स डार्विन को जीवन के विविध रूपों को देखने का मौका उन समुन्द्र यात्राओं के दौरान मिला, जो उनोहने एच. एम्. एस बीगल जहाज से प्रशांत महासागर के द्वीपों की थी। इस दौरान उनोहने वहां की चटटनों-शिलाओं, पौधों, जानवरों आदि को देखा और उनके आकर आकृतिओं की बनावट और उनकी गतिविधिओं को गंभीरता से परखा और समझा फिर 1859 में आई अपनी किताब “ऑन द ओरिजिन ऑफ़ स्पीशीज ” में इन तमाम बातों का उनोहने जिक्र किया / चूकी इस किताब में रेफरेन्सेस और सूत्र नहीं दिए जा सके इसलिए डार्विन को काफी समय तक इसका अफ़सोस था उनोहने प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया के माध्यम से विकाश वाद के सिद्धांत की “थ्योरी ऑफ़ नेचुरल सलेक्शन” पेश किया था।  उनकी दो किताबें सबसे ज्यादा मशहूर हुई -ऑरिजनल ऑफ़ स्पीशीज और अस्तित्व के लिए संघर्ष। डार्विन लम्बे समय तक खुद यही मानते थे कि हर जीव को ईश्वर ने बनाया है। इस सोच को बाद में उन्होंने अपनी गलती माना और इस रहस्य को जिज्ञासा और मेहनत के बूते जान्ने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि हर जीव की उत्पत्ति एक ही पूर्वज से हुई है जीवन की शुरुआत उससे हुई है  जिसमे जीवन था ही नहीं। हर जीव ने कई बदलाव लिए और संघर्षमय  संसार में खुद को ढालते हुए एक नए रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई।

यद्यपि वे अपेक्षाकृत शांत और अध्ययनशील जीवन जीते थे, फिर भी उनके लेखन उनके दिनों में भी विवादास्पद थे और आज भी नियमित रूप से विवाद को जन्म देते है। चर्चा में चार्ल्स डार्विन इन दिनों फिर चार्ल्स डार्विन विकासवाद का सिद्धांत खूब चर्चा में है।  अखिल भारतीय वैदिक सम्मेलन में मध्य महाराष्ट्र के औरंगाबाद में आये पूर्व आई पी एस अधिकारी व केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह ने कहा हमारे पूर्वजों सहित किसी ने भी लिखित या मौखिक रुपों में यह नहीं कहा है कि उन्होंने लंगूर को इंसानो में बदलाव देखा है।                   

उन्होने संवाददाताओं से बातचीत में कहा की मनुष्य के क्रमिक विकास का चार्ल्स डार्विन का सिद्धांत वैज्ञानिक रूप से गलत है। उन्होंने कहा कि स्कूल और कॉलेज पाठ्यक्रमों में इसे बदलने की जरुरत है।  श्री सिंह ने जोर देते हुए कहा कि इंसान जबसे धरती पर देखा गया है हमेशा इंसान ही रहा है।  सत्यपाल सिंह का दखल विज्ञान में नहीं है फिर भी उन्होंने डार्विन के इस सिद्धांत को सिरे से खारिज कर दिया है

डार्विन के क्रमिक विकास सिद्धांत पर केंद्रीय मंत्री के बाद अब वैज्ञानिकों ने भी सवाल खड़े करने शुरू कर दिया।  लखनऊ यूनिवर्सिटी में वेदो में ज्योतिष तथा विज्ञान विषय पर हुए सेमिनार में नासा के वैज्ञानिक और प्रधानमंत्री के पूर्व वैज्ञानिक सलाहकार प्रो० ओ पी पाण्डे ने भी इसे सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि देश भर के बच्चों को गलत सिद्धांत पढ़ाया जा रहा ही जिससे उनपर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।  उन्होंने बच्चों को सही इतिहास पढ़ाने की सलाह दी। उन्हें यह सत्य पढ़ाया जाना चाहिए कि वे इंसानों की ही उत्पत्ति हैं न कि किसी जानवरों की।

प्रो० पाण्डे ने कहा कि डार्विन के सिद्धांत के मुताबिक़ हम बन्दर से चिम्पांजी और फिर मानव बने, जबकि बन्दर कभी मानव बन ही नहीं सकता बंदरों में 24 क्रोमोसोम होते है और मनुष्यों में 46 ऐसे में अगर बन्दर से मनुष्य बने होते तो अतिरिक्त क्रोमोसोम कहां से आये ? समय अनुकूल स्वरूप में परिवर्तन हो सकता है लेकिन अंगो में परिवर्तन नहीं हो सकता है इसलिए सिद्धांत सही नहीं है।  प्रो०  पाण्डे ने बताया कि साल 1905 में डार्विन के बेटे जॉर्ज डार्विन ने अपने पिता डार्विन के सिद्धांत को  कल्पना मात्र बताया था।  विज्ञान और तर्क दोनों में यह सिद्धांत कभी भी साबित नहीं हुआ। 21वी सदी के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत स्व उत्त्पत्तिवादी सिद्धांत E-7 (Auto Genetic Theory For Genome) के प्रतिपादक जेनेटिक वैज्ञानिक , साइंस फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग पुस्तक के लेखक एवं मानव उत्पत्ति और विकास पर विश्व इतिहास शोधार्थी डॉ प्रभाकर राव, गोविन्द राव चावरे का भी कहना है कि चार्ल्स का विकासवाद कहने को तो तर्क पर आधारित है किन्तु तर्क युक्त नहीं है।  डार्विन किसी को भी संतुष्ट नहीं कर सकें और ना ही उन्हें अपने आप पर यकीन था।  उन्होंने प्रश्न करते हुए कहा कि यदि चिम्पांजी या बानर से मानव का विकास हुआ तो चिम्पांजी कहां से आया ? आजतक यह क्यों नहीं बोलता ? उन्होंने बताया कि आज भी मास्को के जूलॉजिकल गार्डन में सीधा खड़ा रहने वाला बानर मौजूद है, लेकिन बोलता नहीं है।  डॉ राव का कहना है कि आज का युग विज्ञान का है और इस वैज्ञानिक युग में मानव की उत्पत्ति के लिए वैज्ञानिक आधार ही माना जायगा न कोई तर्क, कुतर्क या माइथोलोजी या टेलियोलॉजी।  ऐसे समय में यह मानना कि मानव का पूर्वज एक चिम्पांजी था , यह तर्क संगत नहीं है। जैसे चिम्पांजी , बानर , शेर, हाथी या दूसरे जीव पैदा हुए वैसे ही मानव भी इसी रूप में पैदा हुआ है , सभी जीवों की उतपत्ति और विकास के लिए बन्दर या ईश्वर की आवश्यकता नहीं है क्योंकि बिग बैंग से लेकर ब्रम्हांड के निर्माण की सभी घटनाएं (Auto Genetic Theory For Genome) में आती है जिसमे मानव भी आता है।

आज विज्ञान के पास DNA , RNA , Genetic एवं स्टेम सेल, स्टेम कोशिका सभी प्रकार के ज्ञान मौजूद हैं जो पूर्व में नहीं थे , आधुनिक विज्ञान के अनुसार पृथ्वी पर माटी मेटर के तत्व मिलते हैं, वही तत्व पूरी सृष्टि में मिलते हैं, पृथ्वी के जीवन धारिओं का शरीर मुख्यतः कार्बन, हाईड्रोजन , ऑक्सीजन , नाइट्रोजन , फास्फोरस आदि से गठित हुए हैं। ये तत्व सृष्टि में लगभग सभी जगह मौजूद हैं।  तत्वों का पदार्थों में और यौगिकों में गठित होना स्वभाविक है , इसलिए सृष्टि में कहीं भी और कभी भी अनुकूल परिस्थितियों के मिलने पर जीवन की शुरुआत हो जाती है और जब एक बार जीवन प्रकट हो गया और वह अपनी रचना खुद करने लगता है।

उसमे चेतना और विकास का हो जाना प्रकृति के मूल नियमों के अनुसार ही है और यही Auto Genetic Theory (स्व उत्पत्तिवादी सिद्धांत का मुख्य आधार है ) जिसके शोध पत्र इंडियन जनरल ऑफ़ सांटिफिक रिसर्च स्पेशल ऑनलाइन इशू नवम्बर 2017 मई में प्रकाशित हुए और भारत के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी व सांइस एंड टेक्नोलॉजी मंत्री डॉ हर्षवर्धन जी के समर्थन पत्र प्राप्त हुए।  अब इस थ्योरी को नोबेल अवार्ड दिया जाए यह मांग विभिन्न संस्थाओं द्वारा हो रही है।

इंडियन फाउंडेशन फॉर वैदिक साइंस के रिसर्च डायरेक्टर डॉ रवि प्रकाश आर्य ने भी कहा की अब मुझे यह कहते हुए बड़ी ख़ुशी हो रही है कि डॉ प्रभाकर राव चावरे इंडियन फाउंडेशन फॉर वैदिक साइंस के फेलो हैं। डॉ प्रभाकर राव ने पृथ्वी पर विभिन्न प्रजातियों के सन्दर्भ में एक सफल शोध किया है।  उनकी शोध से प्रमाणित होता है कि सभी जीव जीवित रहते और स्वतंत्र रूप से स्वचालित रूप से विकसित होते हैं।  विशेष रूप से उपयुक्त वातावरण में।  उन्होंने अपने सिद्धांत को “एटो जेनेटिक थ्योरी ऑफ़ इवोल्यूशन” नाम दिया जिसने पहली बार चार्ल्स डार्विन की प्रजातियों के जैविक विकास के सबसे लोकप्रिय परिकल्पना को चुनौती दी है।  आगे डॉ आर्य ने कहा कि मुझे लगता है कि डॉ प्रभाकर चावरे के शेक्षिणक जीवन के 40 वर्षों के बहुमूल्य युगांतर कारी शोध के लिए उन्हें परष्कृत करने का उपयुक्त समय आ गया है जैव विकास को समझने के लिए दार्शनिक वैज्ञानिक शताब्दियों से प्रयास कर रहें हैं और आज भी प्रयास हो रहा है।  इस संबंध में तीन सिद्धांत उल्लेखनीय हैं – लेमार्कवाद , डार्विनवाद और उत्परिवर्तनवाद।  जेनेटिक वैज्ञानिक डॉ प्रभाकर राव गोविन्द राव चावरे ने मानव उत्पत्ति के लिए नवीन और वास्तविक चौथा सिद्धांत “स्वोत्पत्तिवादी सिद्धांत ”  दिया है जिससे हजारों सालों से चली आ रही मानव उत्पत्ति से सम्बंधित धारणाओं पर विराम लग जाएगा।

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